संवादसूक्त

कुछ मुख्य संवादसूक्त – 

वे सूक्त, जिनमें दो या दो से अधिक देवताओं, ऋषियों या किन्हीं और के मध्य वार्तालाप की शैली में विषय को प्रस्तुत किया गया है, प्राय: संवादसूक्त कहलाते हैं। कुछ प्रमुख संवाद सूक्त इस प्रकार हैं-
पुरूरवा-उर्वशी-संवाद ऋ. 10/95
यम-यमी-संवाद ऋ. 10/10
सरमा-पणि-संवाद ऋ. 10/108
विश्वामित्र-नदी-संवाद ऋ. 3/33
वशिष्ठ-सुदास-संवाद ऋ. 7/83
अगस्त्य-लोपामुद्रा-संवाद ऋ. 1/179
इन्द्र-इन्द्राणी-वृषाकपि-संवाद कं. 10/86
संवाद सूक्तों की व्याख्या और तात्पर्य वैदिक विद्वानों का एक विचारणीय विषय रहा है; क्योंकि वार्तालाप करने वालों को मात्र व्यक्ति मानना सम्भव नहीं है। इन आख्यानों और संवादों में निहित तत्त्वों से उत्तरकाल में साहित्य की कथा और नाटक विधाओं की उत्पत्ति हुर्इ है

पुरुरवा-उर्वशी संवाद  ( 10.95 )

यह ऋग्वेद के 10 वें मंडल का 95वां सूक्त है।
इसमें 18 मंत्र हैं।

२ सरमा-पणि संवाद  ( 10/ 108 )

यह ऋग्वेद के 10वें मंडल का 108 वां सूक्त है।
इसके ऋषि पणि हैं और देवता सरमा, पणि हैं। छन्द त्रिष्टुप है ।

3 यम-यमी संवाद  ( 10/ 10 )

यह ऋग्वेद के 10वें मंडल का 10वां सूक्त है।
यम यमी संवाद में देवता या ऋषि यमी वेवस्वती या यम वैवस्वत हैं।
छंद त्रिष्टुप है।

4 विश्वमित्र-नदी  ( 3/33 )

विश्वमित्र-नदी संवाद सूक्त ऋग्वेद के तीसरे मंडल का 33 वां सूक्त है।
इसके ऋषि विश्वमित्र और देवता नदी है।
इसमें विपाशा और शुतुद्री नदियों का वर्णन  आया है।
विश्वमित्र-नदी संवाद सूक्त में पंक्ति, उष्णिक और त्रिष्टुप छंद हैं।

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