नीतिश्लोक – नीतिशतकम् – साहित्य सङ्गीत कला विहीनः……

साहित्य सङ्गीत कला विहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः।

तृणं न खादन्नपि जीवमानः  तद्भागधेयं परमं पशूनाम् ।

श्लोक -वाचन 


भावार्थ 

साहित्य (गद्य,पद्य, नाटक आदि साहित्य) सङ्गीत (संगीत) कला (कौशल) विहीनः (बिना) साक्षात्पशुः (प्रत्यक्ष जानवर) पुच्छ (पूँछ) विषाण (सींग) हीनः (बिना)। तृणं (तिनका/ घास) खादन्नपि (न खाते हुये भी) जीवमानः (जीवित रहता हुआ) तद् (वह) पशूनाम् (पशुओं का) परमं (परम) भागधेयं (भाग्य) (अस्ति)।

श्लोक व्याख्या – वीडियो 


राजा भर्तृहरि ने क्या सन्देश दिया है 

“बिना पढ़े नर पशु कहावें”
  तुलसीदास जी ने शिक्षा के महत्व को बताते हुए यह पंक्तियां कहीं है।

और इन पंक्तियों का और अधिक स्पष्ट रूप आपको इस श्लोक में देखने को मिलेगा।

जिसमें राजा भर्तृहरि ने कहा है। कि यदि मनुष्य शिक्षित नहीं है तो वह बिना पूँछ और बिना सींग के पशु है।

इस श्लोक में राजा भर्तृहरि कहते हैं।

जो मनुष्य साहित्य से ,संगीत से , तथा कला से हीन है। वह मनुष्य  पशु के समान है जो कि तृण ना खाते हुए भी जीवित है। तो यह पशुओं का परम सौभाग्य है।

श्लोक में समाज के लिए सन्देश

श्लोक में समाज के लिए यह सन्देश  है। कि साहित्य जिसको समाज का दर्पण कहा जाता हैयदि व्यक्ति ने  साहित्य नहीं पढ़ा है।

तो उसके व्यवहार समाज के अनुकूल नहीं होंगे।

क्योंकि साहित्य हमें सामाजिक ज्ञान प्रदान करता है। जब हम विभिन्न प्रकार के साहित्य का अध्ययन करते हैंतो हमें विभिन्न प्रकार के समाज से जुड़ने का व्यवहार करने का ज्ञान प्राप्त होता है ।

कला अर्थात कौशल जीवन में क्यों आवश्यक हैं ? 

श्लोक में  “कला से विहीन” कहने से तात्पर्य यह है कि यदि व्यक्ति कौशलों से हीन है  तो समाज में, संसार में उसे अपने जीवन को

भली-भांति यापन करने में समस्याएं होंगी इसलिए कला जीवन का  एक महत्वपूर्ण अंग  है

“संगीत से विहीन ” कहने का क्या तात्पर्य है ?

“संगीत से विहीन मनुष्य” कहने का  तात्पर्य है  यदि व्यक्ति में भाव हैं तो उसे संगीत प्रिय होगा और जो संगीत प्रिय व्यक्ति हैं उसके अंदर भाव अवश्य होते हैं अतः यदि व्यक्ति संगीत जानता है अर्थात व्यक्ति अन्य सामने वाले व्यक्ति का भाव पढ़ना जानता है

तो वह मनुष्य है अन्यथा वह पशु के अतिरिक्त कुछ नहीं । 

शिक्षा जीवन का आवश्यक अंग क्यों  है ?

श्लोक  में राजा भर्तृहरि  ने समाज को यह बताने का प्रयास किया है कि हमें साहित्य, कला, यानी कौशल और संगीत की  शिक्षा अवश्य प्राप्त करनी चाहिए तथा  हमें समाज में शिक्षित होकर रहना चाहिए

यदि हम शिक्षित होंगे, तो समाज शिक्षित होगा समाज शिक्षित होगा, तो राष्ट्र शिक्षित होगा और राष्ट्र शिक्षित होगा, तो सभी का विकास निश्चित है इसलिए वे कहते हैं कि जो साहित्य संगीत और कला से विहीन व्यक्ति हैं वह साक्षात पशु के समान ह

 

व्याख्या - Explanation
श्लोक की चित्रात्मक व्याख्या

श्लोक की चित्रात्मक व्याख्या